हरेला पर्व

हरेला जैसे की नाम से विदित है चारो और हरियाली। हरेला उत्तराखंड के परिवेश और खेती के साथ जुड़ा हुआ पर्व हैं । यह चैत्र मास के प्रथम दिन बोया जाता हैं तथा नवमी को काटा जाता है ।


उत्तराखंड मे श्रावण मास मे पड़ने वाले हरेला को अधिक महत्व दिया जाता हैं क्योंकि श्रावण मास शंकर भगवान को विशेष प्रिय होता है । उत्तराखंड एक पहाड़ी राज्य हैं तथा पहाड़ पर ही भगवान का वास होता हैं। इसलिए श्रावण मास पर हरेला का विशेष महत्व होता हैं। जगह-जगह पर खुशहाली के लिए वृक्षारोपण किया जाता है ताकि जमीन बंजर ना हो पेड़ लगाकर भूमि के कटाव को रोका जाता है।ताकि सभी पशु-पक्षी् जीव-जानवर व व्यक्ति सुरक्षित रह सके।


सावन लगने से 9 दिन पहले आषाढ़ मे हरेला बोने के लिए एक पात्र मे मिट्टी डालकर 5 या 7 प्रकार के अनाज जैसे – गैहूँ, जो, धान, गहत्त,भट्ट, उडद, सरसों, आदि अनाजों के बीजों को मिलाकर बोया जाता है व एक कपड़ें से ढक कर रखा जाय ता हैं । जब वे 7 या 8 दिन मे चार व छह ईंच लम्बे हो जाते है तो उन्हें पूजा करके. पूरे आदर के साथ काटकर सबसे पहले देवताओं को चढ़ाया जाता है व परिवार के सभी लोगों के सिर पर रखते है साथ. मे सभी रिश्तेदार व आस पड़ोस मे भी बाटा जाता हैं व गांव. के लोग. गोबर से हरेला की जड़ पर लगाकर अपने दरवाजे पर लगाते हैं । जो की शुभ माना जाता हैं।


यह पर्व सुख-समृद्धि का प्रतीक हैं यह मान्यता है कि जितनी अच्छी फसल होगी उतनी ज्यादा घर मे फसल ज्यादा व व्यापार मे तरक्की मिलेगी इसलिये हरेला काटा जाता है। सभी लोग प्रभू से अच्छे फल की कामना करते है।




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